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तुम इंसान बना दो

याद किया कई बार दिल ने दिल को टुटा तारा दिला दो तुम दिखाई दो कही यहा अब शिशे को ऐसी रोशनी ला दो तुम्हारा नशा इतना चढ गया दिन मे चांद ढुंढने लग गये वक्त सिधा चल रहा है अभी उसेभी थोडी शराब पिला दो नफरत भरी निगाहो से देखा फिरभी नफरत नही कर पाये बैर रखे जमिन भी मिट्टी से हमे नफरत की ऐसी दवा दो तुम छुओ पत्थर धडक जाये होश हमने खोया है कब से फुरसत मिले कभी तुमे तो हमेभी फिरसे इंसान बना दो सामने आना, फिर चले जाना इन्हसे भी सुकुन मिलता है अब कभी आओगे सामने तो सासो मे जरासा दर्द मिला दो

खामोशिया

वक्त खामोश है, इस रात से अलग होकर जिसने चांद की चाह में गगन का रूप लिया है उस दिल की तरहा, सदिओ पुरानी है ये चाहत और  सदिओ से चलती आ रही है ये अमावस  शांत हो गयी है अब दोनो की धडकने, बादल भी थम गये है कही, जिसपर हवा का आना-जाना था ओ चंचल लहरे भी रुक गयी,   आकाश में चमकती तितलियों ने भी अब पलके मिटा दी  दर्द की दर्दभरी दास्तान ले कर जी रहे वक्त से मैं क्या बोलूं? कैसे कहू, क्यू खामोश है तू भी? उसने भी सजाई है मेहफिले हजारो, उसने भी हर कब्र पर  है आसू बहाये  मेरी खामोशिया तो  उन्ह लब्जो की नाराजगी है जिने कोई सुनता नही, मेरी खामोशिया उन्ह आसुओ कि रुसवाई है  जिनको कोई देखता नही, तू भी नही     मैं तो कहा देखा है  वक्त के अश्को को,   वक्त के अल्फाज को सुनेने की कोशिश भी नही की कभी  शायद वक्त मायूस है मेरे से,  मेरी तरहा पर दोनो का साथ चलाना अनिवार्य है वक्त भी चल रहा है और मैं भी, अब तू भी चल दो कदम मेरे साथ..  तेरे साथ में खामोशिया खामोश हो...

थक गये

इस आंगण में दिया जलाते जलाते थक गये दो दिवारों की रखवाली करते करते थक गये बहरूपियों का मुखौटा लेने निकले थे घर से साफ आईने की सुरत देखते देखते थक गये बदतमीजी से भी शराब नही पी हमने कभी शराफत से तेरी ये दवा पिते पिते थक गये मुहावजा मांग रहे है ये कटे हुये फुल मुजसे उन्ह में हम खुनी रंग भरते भरते थक गये मंजिल नही बदली बस कब्र अलग है आज तेरे इश्क का कफन पहनते पहनते थक गये इसी जगहा पैदा हुआ था विवेक कल परसो यहा मोहोब्बत में तेरे मरते मरते थक गये 

मॉ

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और एक सुबहा, रात की गोद मे खेलते खेलते रोशन हो गयी... उस रात का सागर की लहरों के साथ लोरी गाना सुबह को हवा के झुले पे झुला झुलाना अब आखिरकार बंद हो गया सुबहा रोशन जो हो गयी लोग कहते है कितनी हसीन है ये सुबह सारी बद्सुरती तो रात ने लेली ये रोशनी, रात का तेज है जो सुबह को दान मे मिला सच तो ये है की रात का मुखडा कोई देख ना सका मॉ की खुबसुरती दिखाये ऐसा आईना कोई ना बना सका सुबह का रात से दुर जाना कोई नयी बात नही मै भी दुर हु बहोत मेरी मॉ से फरक इतना है उन्ह दोनो मे है बस एक दिन का फासला और इस दुरी की नही है कोई इन्तेहा

अपना

जिसकी रोशनी मेरे सिने पे थी आखिरकार ओ तारा टूट गया चिराग ढुंढते ढुंढते इस आंधी मे किससे मेरा भी सीना लूट गया खाली गुलदान था इसी जगहा किसीने आ कर उसे भर दिया जिस खुशबू के लिये तरसा उसी खुशबू मे दम घुट गया अंधेरे की तलाश मे एक दिन छोडा था जुगनू ने यहा घर रात मिली उसे कही लेकीन खाली हात ओ घर लौट गया बरसात मे शजर की छॉव मे मिले थे हम दोनो के साये ये समा कुछ इस तरहा टुटा की अब आसमॉ भी रुठ गया वक्त मिले कभी तो आ जाना शायद मकान दिखेगा ‘अपना’ बची है ‘अपनी’ ऊँची इमारत यहा पर ‘अपना’ आशियाना मिट गया

हसी

हसी की शागिर्दी दिखाई दे ऐसी बात है ये चौदहवे दिन पर राज करे ऐसी रात है ये दो अल्फाजों की ये सरगोशियां है लेकिन घुंगट मे छुपे मोगरे के गंध सी शांत है ये कितनी की हमने हमारे जमिर से गुफ्तगु दिल टकराये किसि से ऐसा आघात है ये खुद की आंधीओं मे खुद का आशियाना टुटा ये आंधी हो जिसपर निसार ओ प्रांत है ये बातों की ये माशुका, उसके लबों का सफर हजारो मुसाफिर समाले इतनी प्रशांत है ये मेघदुत बने विवेक को कोई सुरत नही यहा ओस की बुंदे बिंदिया जिसकी ओ प्रात है ये

काहीस असच

छेडून मंद जीव हा शब्दांनी घात केला  उरला फक्त एकांत झुला  जसा हलतो सागर खुला  देखण्या सुरांचा नाद हा  घोटून घोटून गायला  प्रतिश्वासांचा जणू हल्ला  श्वासांनी कसाबसा पचवला  आता झुलवता झुलवता  तुटलं आकाश पेटला वणवा  भग्नावस्थाचा हा राग   पेटत्या झाडांनो तुम्हीच मिटवा  ह्या तरल शांततेचा  हा असा सरळपणा  ह्या शांत थंडीतून  'तो' मुसळधार पाझरावा  पाझरलेल्या थंडीतून  शांत व्हावं सार  स्थिरावलेल्या झुल्यावर  निपचित पडाव गार वार