अपना

जिसकी रोशनी मेरे सिने पे थी
आखिरकार ओ तारा टूट गया
चिराग ढुंढते ढुंढते इस आंधी मे
किससे मेरा भी सीना लूट गया

खाली गुलदान था इसी जगहा
किसीने आ कर उसे भर दिया
जिस खुशबू के लिये तरसा
उसी खुशबू मे दम घुट गया

अंधेरे की तलाश मे एक दिन
छोडा था जुगनू ने यहा घर
रात मिली उसे कही लेकीन
खाली हात ओ घर लौट गया

बरसात मे शजर की छॉव मे
मिले थे हम दोनो के साये
ये समा कुछ इस तरहा टुटा
की अब आसमॉ भी रुठ गया

वक्त मिले कभी तो आ जाना
शायद मकान दिखेगा ‘अपना’
बची है ‘अपनी’ ऊँची इमारत यहा
पर ‘अपना’ आशियाना मिट गया

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