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तलाश

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तलाश अभीभी है तलाश अभीभी है उसकी जिसकी आंखो मे वसंत का तेज गुजारा करता हो, पलके मिट जाये तो लगे शिशिर आ गया खुल जाये तो लगे दिया जल गया जिसकी आवाज मे हो हूर की अदा जिसके माथे पे सुबह करती हो सजदा जिसकी चाल हो झरने सी चले तो ले चले रूह को रूके तो रोक ले नूर को जिसके जिस्म पर जलते है हजारो चिराग जहा मिल जाये पहेली रोशनी का सुराग तलाश है इक जिस्म की तलाश है इक रूह की तलाश है इक दिल की तलाश है उसकी जिसे ढुंढते ढुंढते ये दिन भी गुजर जायेगा...

मी जागा रहातो..

दिवसा कुठे तरी दडून बसलेली रात्र ह्यावेळी आकाशा येवढी मोठ्ठी होते एकटीच ‘ना सोयरे ना सुतक’ ह्या नियमाने तीनेही एकटेपण स्वीकारल असाव कदाचित ह्या इतक्या शांततेतही रातकिडे मात्र जिवंतपणाची आठवण करून देतात पण ते हसाताहेत की रडताहेत काहीच कळत नाही तरीही कळल्याचा आव आणून मीही कधी हसतो तर कधी रडतो अस म्हणतात रासायनिक प्रक्रियेने काजव्यांमध्ये प्रकाश तयार होतो रात्र फक्त एक निमित्त रासायनिक प्रक्रिया आमच्यातही होते पाणी पापण्यांपर्यंत नीरस असते ओघळताना खारे बनते दु:ख फक्त एक निमित्त पृथ्वी गोल आहे हे आता जाणवत रिकाम्या पहाटेबरोबर मग मलाही ‘शुन्यत्वाचा’ भास होतो तो भास नसल्याचा दिलासा पहाट करुन जाते मी मात्र रात्रीला काळोखाचा शाप आणि दिवसाला तेजाच वरदान ह्याशिवाय स्वार्गस्थ शक्तींना काहीच चमत्कार करता येत नाहीत अस मानून असाच जागा रहातो जशी रात्र रात्री जागी असते अगदी तसाच

चाहत

मोमबत्ती जल रही है पर उजाला खो गया अकेले में भी तन्हाईने भी तन्हा कर दिया जरासा टुट गया जरासा रुठ गया जोडने गये दिल जब हवाओं ने रुख बदला ना दवा है काम की ना दुवा है असरदार इश्क की बिमारी है और नफरत का है कारोबार बातो बातों मे एक बात निकली उसे समज मे आये तभी रात हो गयी रात मे बुज जाये ऐसी ये चिंगारी नही अंधेरे मे मिट जाये ऐसी ये आशिकी नही सुबह की प्रतिक्षा नही ओस की बुंदों की है चाहत रोशनी की नही अपनीही विरानगी की है

दिवार

हमे आशियाना चाहिये था.. तुने दिवार बनाई.. जब से ये दिवार बनी है ना चांद उतरा है आसमान मे ना सुरज दिवार के उस तरफ है तु और इस तरफ है बस अंधेरा वक्त के साथ इतनी मजबुत हो रही है ये दिवार की अब यादों को खामोशी की और ख्वाबों को बंद आखों की आदत हो रही है इस हवा मे एक घृणा है दिया जलाने जाता हु और आग लग जाती है दिवार ने भी ये कैसा बैर लिया है मै लिखने जाता हु मोहब्बत और मलबा गिर जाता है सोचता हु गिरते मलबे के साथ गिर जाये ये दिवार भी दिवार तो गिर जायेगी पर तेरी नफरत का क्या? बेहतर यही है की इस दिवार से ही मोहब्बत की जाये.. मोहब्बत से नफरत करने से अच्छा है नफरत से मोहब्बत की जाये..

रात..

रात हो रही है दिया जल रहा है डर उस रात का नही.. डर इस बात का है की सुबह से पहले दिया न बुझ जाये धडकने तेज हो रही है बढते अंधेरे मे चार दिवारों मे बंद मै और मेरा साया गुफ्तगू करते करते थक गये अब देख रहा हु खिडकी के बाहर यहा एक शजर थी फुल खिला था कल.. आज क्यु मुरझा गयी? शायद फुल तोडा होगा किसीने दिल टुटने का गम दिवारों के अंदर भी है और बाहर भी हवा के लहरों का नशा आखोंपर चढ रहा है पलके अब मिट रही है दिया अभीभी जल रहा है चार दिवारों मे हर रात नयी कहानी जन्म लेती है मै पढता हु मेरा साया सुनता है जब तक दिया जल रहा है, मै कहानी पढाता रहता हु साया सुनता रहता है जब दिया बुजता है साया खो जाता है कही अंधेरे मे और मै सो जाता हु किसी कहाणी मे

बा. सी. मर्ढेकरांच्या जन्मदिनानिमित्त..

सकाळी सकाळी। उघडावे वृत्तपत्र, पहावे राशीचक्र। ‘श्रद्धेपोटी’॥ कालची ‘चपटी’। करावी ‘उलटी’, सुगंधी अत्तर। माळावा देही॥ घरातून आज। लवकर निघावे, नजर लावावी। तिच्या दारी॥ बाहेरूनच करावे। इशारे गुलाबी, तिच्या घरी म्हणे। कुत्री असती॥ इतक्यात यावा। गोजिरा कोणी, ध्यानी ना मनी। तिस मारावी मिठ्ठी॥ चुरचुर आवाज। यावा कानी, प्रेमाच्या काचा। फुटाव्या ह्रदयी॥ काळाची कृपा। काय सांगावी, व्हावा अंधार। सुर्याखाली॥ होता सायंकाळ। गाठावी गल्ली, पुन्हा तीच 'चपटी'। तीच 'उधारी'॥ आता नवा अंधार। रात्र कालची॥ करावी नशा जुनीच। ‘अंध:श्रद्धेपोटी’॥

एक क्लास

नींद नही आती आज कल आखो मे जो धुआ था आज बर्फिली धुप बन गया इतना प्यारा नगमा है की ये पलके भी मिटती नही आज कल ऐसा लगता है जजिरा मिल गया जहा जुगनु की रंगीन ‘रोशनी’ से ‘सृष्टी’ झुम जाती हो जहा हरियाली इतनी सजी हो की लगे ‘पूजा’-पाठ कर रही है दिगंत पर जहा ‘शुभांगी’सी हसीन शजर अपनी खुशबू को ‘मल्लिका’ के गंधसी गुजरते पलों मे मिला ती हो जहा चांद का जमाल भी ऐसा उतरता हो जमिन पर जैसे ‘अरुषी’ आती है सुरज से जहा ‘निशी’ के साथ बेखौफ हो रंजनीगंधा जो जिवित है ‘आयुशी’ की तरहा, बेहती है कस्तुरीसी जहा हो ओस की ‘मिहिका’, झरने की जीवीका जहा हो आशियाना ‘अनिकेत’ की शाश्वती से भरा जहा दवाग्नी भी ‘प्रार्थना’ करता हो मेघाओं के राजा ‘मेघन’ से जिसकी ‘आस्था’ ‘राघव’ के जिवनसी पवित्र है जहा सबको हो स्मरण खुद के ऐहसास का जिसे ‘सिमरन’ कहते है जहा हो ‘अभिरुची’ शांती की, ईच्छा ‘मनिष’ की, सुंदरता ‘प्रियांका’ की जहा हो ‘मेहेक’ खेतों मे खिले पिले सोने की, शहदसी मधुरता हो ‘मधुनिका’ की जहा हो तेज ‘आदित्य’ का, मन ‘मानसी’ का, सुर ‘सानिका’ का जहा हो 'कबीर'सा कोई संत जिसका ना हो कोई ईमान, जिसक...