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दिवार

हमे आशियाना चाहिये था.. तुने दिवार बनाई.. जब से ये दिवार बनी है ना चांद उतरा है आसमान मे ना सुरज दिवार के उस तरफ है तु और इस तरफ है बस अंधेरा वक्त के साथ इतनी मजबुत हो रही है ये दिवार की अब यादों को खामोशी की और ख्वाबों को बंद आखों की आदत हो रही है इस हवा मे एक घृणा है दिया जलाने जाता हु और आग लग जाती है दिवार ने भी ये कैसा बैर लिया है मै लिखने जाता हु मोहब्बत और मलबा गिर जाता है सोचता हु गिरते मलबे के साथ गिर जाये ये दिवार भी दिवार तो गिर जायेगी पर तेरी नफरत का क्या? बेहतर यही है की इस दिवार से ही मोहब्बत की जाये.. मोहब्बत से नफरत करने से अच्छा है नफरत से मोहब्बत की जाये..

रात..

रात हो रही है दिया जल रहा है डर उस रात का नही.. डर इस बात का है की सुबह से पहले दिया न बुझ जाये धडकने तेज हो रही है बढते अंधेरे मे चार दिवारों मे बंद मै और मेरा साया गुफ्तगू करते करते थक गये अब देख रहा हु खिडकी के बाहर यहा एक शजर थी फुल खिला था कल.. आज क्यु मुरझा गयी? शायद फुल तोडा होगा किसीने दिल टुटने का गम दिवारों के अंदर भी है और बाहर भी हवा के लहरों का नशा आखोंपर चढ रहा है पलके अब मिट रही है दिया अभीभी जल रहा है चार दिवारों मे हर रात नयी कहानी जन्म लेती है मै पढता हु मेरा साया सुनता है जब तक दिया जल रहा है, मै कहानी पढाता रहता हु साया सुनता रहता है जब दिया बुजता है साया खो जाता है कही अंधेरे मे और मै सो जाता हु किसी कहाणी मे

बा. सी. मर्ढेकरांच्या जन्मदिनानिमित्त..

सकाळी सकाळी। उघडावे वृत्तपत्र, पहावे राशीचक्र। ‘श्रद्धेपोटी’॥ कालची ‘चपटी’। करावी ‘उलटी’, सुगंधी अत्तर। माळावा देही॥ घरातून आज। लवकर निघावे, नजर लावावी। तिच्या दारी॥ बाहेरूनच करावे। इशारे गुलाबी, तिच्या घरी म्हणे। कुत्री असती॥ इतक्यात यावा। गोजिरा कोणी, ध्यानी ना मनी। तिस मारावी मिठ्ठी॥ चुरचुर आवाज। यावा कानी, प्रेमाच्या काचा। फुटाव्या ह्रदयी॥ काळाची कृपा। काय सांगावी, व्हावा अंधार। सुर्याखाली॥ होता सायंकाळ। गाठावी गल्ली, पुन्हा तीच 'चपटी'। तीच 'उधारी'॥ आता नवा अंधार। रात्र कालची॥ करावी नशा जुनीच। ‘अंध:श्रद्धेपोटी’॥

एक क्लास

नींद नही आती आज कल आखो मे जो धुआ था आज बर्फिली धुप बन गया इतना प्यारा नगमा है की ये पलके भी मिटती नही आज कल ऐसा लगता है जजिरा मिल गया जहा जुगनु की रंगीन ‘रोशनी’ से ‘सृष्टी’ झुम जाती हो जहा हरियाली इतनी सजी हो की लगे ‘पूजा’-पाठ कर रही है दिगंत पर जहा ‘शुभांगी’सी हसीन शजर अपनी खुशबू को ‘मल्लिका’ के गंधसी गुजरते पलों मे मिला ती हो जहा चांद का जमाल भी ऐसा उतरता हो जमिन पर जैसे ‘अरुषी’ आती है सुरज से जहा ‘निशी’ के साथ बेखौफ हो रंजनीगंधा जो जिवित है ‘आयुशी’ की तरहा, बेहती है कस्तुरीसी जहा हो ओस की ‘मिहिका’, झरने की जीवीका जहा हो आशियाना ‘अनिकेत’ की शाश्वती से भरा जहा दवाग्नी भी ‘प्रार्थना’ करता हो मेघाओं के राजा ‘मेघन’ से जिसकी ‘आस्था’ ‘राघव’ के जिवनसी पवित्र है जहा सबको हो स्मरण खुद के ऐहसास का जिसे ‘सिमरन’ कहते है जहा हो ‘अभिरुची’ शांती की, ईच्छा ‘मनिष’ की, सुंदरता ‘प्रियांका’ की जहा हो ‘मेहेक’ खेतों मे खिले पिले सोने की, शहदसी मधुरता हो ‘मधुनिका’ की जहा हो तेज ‘आदित्य’ का, मन ‘मानसी’ का, सुर ‘सानिका’ का जहा हो 'कबीर'सा कोई संत जिसका ना हो कोई ईमान, जिसक...

पानी

पानी, हा मेरे प्यारे दोस्तो वही पानी जिसे तेलुगू में नीरु, कन्नड में नीर, संस्कृत में वारी, उर्दू में आब तमिल में तनीं और हिंदी में पानी कहते जिसमे लाल मिलाये तो खून बनता है नमकीन मिलाये तो आसू बनता है जो आसमान में बनता है पहाडोसे गुजरते नदीओ से बेहता है जो आपके जिस्म में समाता है हा वही पानी जो आपकी मेरी मेहबुबा के बालो में छुप जाता हैं रोम रोम में खो जाता हैं वही पानी जिससे आग बुजाने पर भाप बनती है प्यास बुजाने पर धडकने बन जाती है ओ पानी आजकल बोतलो में आता हैं कुछ अलगसा है ये पांनी RO, VO, XO, JIO से purify हुआ आपके आसुओ से भी सस्ता अब्र के बुंदोसे भी स्वच पानी इस पानी का इक हिस्सा देगा आपके बच्चो को शिक्षा तो आओ खरीदो ये पानी high definition वाला पानी... आपके आसुओ से भी सस्ता अब्र के बुंदोसे भी स्वच पानी

मै और मेरी माशुका

मैने मेरी माशुका से कहा की - चेहरे की नुमाइंदगी करता ओस का बुलबुला बन जाऊ मै चेहरे की मासुमियत छुती बारिश  की  बुंद बन जाऊ पर मेरी माशुका इतनी नफरत करती है की उसने कहा- तू बन जा ओस का बुलबुला, मै सुबह की धूप बन जाऊ बारिश की बुंद बन जा, मै जलती आग बन जाऊ फिरभी प्यारभरे लब्जोसे  मैने कहा- पलकों को अपनी नर्म बाहो में समेटती शाम बन जाऊ मै इन आँखो की मेहेरबानी लेने रंगीन तितली बन जाऊ उसने फौरन कहा- बन जा तू शाम नर्म बाहो की, मैं थंडी रात बन जाऊ तितली बन जा तू रंगीन, मैं नरभक्षी फुल बन जाऊ मैं बेहाल, मैने कहा- बालों को अपने कंधोपर लहरता हवा का झोका बन जाऊ भौह की अदाओ को समाने मैं तेरा माथा बन जाऊ उसने अपने बालों को सवरते हुए कहा- तू बन जा हवा का झोका, मैं उसे चिरता पहाड बन जाऊ बन जा मेरा माथा, फिर मैं बदसुरत बन जाऊ थोडी उदासी से मैने कहा- तु पास होने का एहसास, तेरी तस्वीर बन जाऊ तु छुने की निशाणी, मै जमीन की मिट्टी बन जाऊ हसते हुए उसने जवाब दिया- तस्वीर बन जा तू, मैं अदृश्य, देहहीन बन जाऊ तू जमीन क...

मैं 'तू' बन जाऊ....

चेहरे की नुमाइंदगी करता ओस का बुलबुला बन जाऊ मै चेहरे की मासुमियत छुती बारिश  की  बुंद बन जाऊ पलकों को अपनी गर्म बाहो में समेटती शाम बन जाऊ मै इन आँखो की मेहेरबानी लेने रंगीन तितली बन जाऊ बालों को अपने कंधोपर लहरता हवा का झोका बन जाऊ भौह की अदाओ को समाने मैं तेरा माथा बन जाऊ तु पास होने का एहसास दिलाती तस्वीर बन जाऊ तु छुने की निशाणी, मै जमीन की मिट्टी बन जाऊ होली में तेरे गालो पर खिलता कोई रंग बन जाऊ मै तूने दिवाली में लगाया जलता दिया बन जाऊ तेरी आवाज को सुनेने मै सुमसान जंगल बन जाऊ तेरी धुंध में नाचणे मैं भी नाचती रागिणी बन जाऊ जहा तेरा आना जाना है उस गली का मैं पत्थर बन जाऊ तुजपर नजर रखे रात का चांद, दिन का सुरज बन जाऊ तू जब आये किनारे पे, तेरी ओर खिचती लहरे बन जाऊ तू भिग जाये बारिश में, में काले बादल बन जाऊ तू चले तो मैं चाल बन जाऊ तू रुके तो रुकावट बन जाऊ चीड जाये तो घुस्सा बन जाऊ तेरी हसी की मैं मुस्कान बन जाऊ तेरी जख्म का मैं मरहम बन जाऊ तेरे अश्कों का खारापन बन जाऊ तू है ओ जहा...