पोस्ट्स

नशा

इमेज
गिली आंखों से प्यार ढुंढना नशा है भरे बाजार में तुझे देखना नशा है ख्वाब भी मिटते है वक्त की लहरों में तेरी याद में बेहता ख्वाब बनना नशा है तस्वीरों का सैलाब गुजरता है खुली पलकों से विरानगी में नशेली निंद को सुलाना नशा है दर्द को बेनक़ाब कर रहे माजी के टुकडे बेनाम दर्द पर तेरा नाम लिखना नशा है मेरी फ़ितरत मे है खामोशी के अनगिनत नगमे प्यार का लब्जो में इजहार करना नशा है यहा आबाद नही है खुशबू खिलते फुल में तेरी अश्कों में मेरा बेखौफ मिटना नशा है तारीकी-ए-शब का जवाब नही विवेक के पास जुगनू बनकर तेरी राह मे खोना नशा है

तुम कहा हो?

इमेज
कब्र में मै जीर्ण तुम कहा हो? जख्म में है खुन तुम कहा हो? दश्त मे खोया प्यार खोयी जिंदगी दिल में सास सुन्न तुम कहा हो? तन्हाई का किनारा मै कश्ती टूटी किनारा मौत का जश्न तुम कहा हो? आसमान को छुता गम का पहाड आसमान निला खुद हैरान तुम कहा हो? रोशनी का खंजर अंधेरे का वार बेबस रात बुजदील दिन तुम कहा हो? सफेद तुम्हारी ओढणी मेरा गुलाबी कफ़न बिस्मिल 'विवेक' का मौन तुम कहा हो?

गीत

इमेज
तेरी आखो को एक गीत मिल गया मेरी रुह को खोया मेघ मिल गया मेंने समजा गम के गुजरने का मतलब तेरे  चेहरे पर  नया नूर खिल गया मैने ढुंढा दिल के कातिल का पता  तेरे होठों का तन्हा सहारा मिल गया अंधी रात को मिला अंजान साया खिलता हिज्र तेरी पलकों पर मिट गया आसूओं ने बताया रुकने का सबब मतलबी दर्द तेरे बाहो में लिपट गया चांद ने कहा सुरज हार गया मैं ने कहा हारा विवेक जीत गया   

अर्ज

इमेज
देख ये सृष्टी खिल गयी इस सजल खुबसुरती के अक्स  से फिर भी तू बेखबर… यही एहसास है तेरा इन्ह लब्जो के एहसास पे शायद सुबह की पहली किरण आशियाना ढुंढते हुये थम जाती होगी तेरी सुरत पर मै कोई आसमानी नही हु जो आफ्ताब की निगरानी करता फिरू मै  तो आशिक, आदमखोर को भी सिकता हु महोब्बत … अब कल्ब का मलबा हुआ है बादलों का पता नही पर एक खयाल है  इन्ह प्यासी आखों मे जिसके कारन ये आब-ए-तल्ख रुख गया है तेरी तस्वीर ने तो पुरा कालचक्र बदल दिया कल तक आजाद था अब बंदी बन गया पर इस खुदगर्ज, पापी, बेशर्म, बुझदिल दुनिया का उन्मुक्त होने से ज्यादा तेरी तस्वीर का उन्मिष बंदी बनना चाहता हु ।

पाडगावकरांचा मंगेश- एक आनंदयात्री

इमेज
भटके पक्षी मधल्या प्रारंभ कवितेतल्या चार ओळी - मी रहातो बोलत: माझे शब्द गर्द पाऊस, माझे शब्द ओल्या उन्हातला फुलपाखरांचा झिम्मा; तू ऐकत असतेस तुझ्यामाझ्यापलीकडे जाऊन; माझे जगणे होते एका गाण्याचा हळुवार प्रारंभ... मंगेश पाडगावकर.. मी तशी त्यांची खुपशी पुस्तक वाचलीत.. जिप्सी, शर्मिष्ठा, भटके पक्षी, कविता माणसांच्या माणसांसाठी, बायबल: नवा करार (भाषांतर व मुक्तिचिंतन) इत्यादी.. पण पाडगावकर हे वाचन्यापेक्षा मी ऐकलेत खुप.. त्यांची गाणी, बालगीते, बडबडगीते... सांग सांग भोलानाथ ने तर पुर बालपण सुट्टीच्या आशेवर अन् शाळेच्या रुसव्या आनंदावर घालवल. येवढच काय तर जुन्या काळी म्हणे त्यांची गाणी गाऊन मुलींना पटवत असत! असो पण का कुणास ठाऊक मला त्यांची 'शर्मिष्ठा'च खुप भाळली... तशी जिप्सी ही भन्नाटच आहे.. पण शर्मिष्ठातल ते काव्यात्मक संवाद विशेषतः ययाती आणि शर्मिष्ठेमधला तो कित्येक छटांनी बहरलेला प्रेमाचा संवाद.. खरच आदिम काळातल प्रेम डोळ्यासमोर उभा करतो.. खर तर मी खुप निराशावादी होतो. काय म्हणतात इंग्लिश मध्ये ते पेसिमिस्टिक... अजुनही आहे थोडासा.. जो काही उत्साही आहे तो केवळ पाडगावकरांमु...

रास्ते की दास्तान

इमेज
बटवारा हुआ था कुछ साल पहले होली खेली थी कुछ रंगों मे बटवारा कुछ इस तरहा हुआ की मेरा दिल टुटा एक हिस्सा लाहोर तो दुजा दिल्ली जा गिरा असल मे रिश्ते अभीभी है पाकीजा एक ओर गिरता है बच्चा तो दुसरी ओर रोती है मा उस बच्चे के दर्द की उस मा के आसू कि मरम्मत करते करते मै थक गया इतना थक गया की दिल धीरे से धडकने लगा इतना की दिल से दिल मे जाने के लिये सास को भी व्हिसा लगने लगा दुनिया सिर्फ जंग ही देखती है लेकीन ना उस बच्चे ने शरारत कि कभी ना उस मा ने डाटा कभी ये प्यार दुनिया को समझाते समझाते मै सच मे थक गया जिस्म को लिपटे कुराण के जलते पन्ने, टूटी हुई मुर्तीया और सरहद्द पार कर चुकी खामोशीया इन्ह सब के साथ जीते जीते लहोर दिल्ली से दुर चला गया और... मै लावारिस हो गया

दंगा

इमेज
बहोत धुआ हुआ था कल शायद लाशे जल रही होगी हजार धरती भी हिल रही थी कल शायद कब्र खोदे होंगे हजार मौत का तांडव देखा था कही तो कही जश्न उस जश्न मे मु छुपाये देखो भगवान भाग रहा है और मौत की चिंगारी पैर छुने दौड रही है यहा सन्नाटा ठिक नही लगता और शोर करना मना है यहा अंधेराभी है मायुस और रोशनी तो गुम हुयी है और मै इन्ह खुनी मलबे मे चल रहा हु ढुंढ रहा हु आदमी की तस्विरे खोज रहा हु बरी की गयी चिजे अब तो हाल यैसा है की आधे दिल को दिमक है तो आधा दिल पत्थर है रात तो बदसुरत थी हि लेकीन ये आसमा तु कब से बन गया बुज्दिल खामोश रहा कातिलों पर धिक्कारहै तेरी रोशनी का अब बहोत दुर गया हु लेकिन वापस आऊंगा जरुर बादलों की गर्जना लेके सन्नाटा मिटाने अफ्ताब के अक्स लेके अंधेरा बुझाने डरे हुये आसमा को होसला देने .. इस धुऐ ने हिलती हुई धरती ने कुछ तो अच्छा किया है....