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मॉ

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और एक सुबहा, रात की गोद मे खेलते खेलते रोशन हो गयी... उस रात का सागर की लहरों के साथ लोरी गाना सुबह को हवा के झुले पे झुला झुलाना अब आखिरकार बंद हो गया सुबहा रोशन जो हो गयी लोग कहते है कितनी हसीन है ये सुबह सारी बद्सुरती तो रात ने लेली ये रोशनी, रात का तेज है जो सुबह को दान मे मिला सच तो ये है की रात का मुखडा कोई देख ना सका मॉ की खुबसुरती दिखाये ऐसा आईना कोई ना बना सका सुबह का रात से दुर जाना कोई नयी बात नही मै भी दुर हु बहोत मेरी मॉ से फरक इतना है उन्ह दोनो मे है बस एक दिन का फासला और इस दुरी की नही है कोई इन्तेहा

अपना

जिसकी रोशनी मेरे सिने पे थी आखिरकार ओ तारा टूट गया चिराग ढुंढते ढुंढते इस आंधी मे किससे मेरा भी सीना लूट गया खाली गुलदान था इसी जगहा किसीने आ कर उसे भर दिया जिस खुशबू के लिये तरसा उसी खुशबू मे दम घुट गया अंधेरे की तलाश मे एक दिन छोडा था जुगनू ने यहा घर रात मिली उसे कही लेकीन खाली हात ओ घर लौट गया बरसात मे शजर की छॉव मे मिले थे हम दोनो के साये ये समा कुछ इस तरहा टुटा की अब आसमॉ भी रुठ गया वक्त मिले कभी तो आ जाना शायद मकान दिखेगा ‘अपना’ बची है ‘अपनी’ ऊँची इमारत यहा पर ‘अपना’ आशियाना मिट गया

हसी

हसी की शागिर्दी दिखाई दे ऐसी बात है ये चौदहवे दिन पर राज करे ऐसी रात है ये दो अल्फाजों की ये सरगोशियां है लेकिन घुंगट मे छुपे मोगरे के गंध सी शांत है ये कितनी की हमने हमारे जमिर से गुफ्तगु दिल टकराये किसि से ऐसा आघात है ये खुद की आंधीओं मे खुद का आशियाना टुटा ये आंधी हो जिसपर निसार ओ प्रांत है ये बातों की ये माशुका, उसके लबों का सफर हजारो मुसाफिर समाले इतनी प्रशांत है ये मेघदुत बने विवेक को कोई सुरत नही यहा ओस की बुंदे बिंदिया जिसकी ओ प्रात है ये

काहीस असच

छेडून मंद जीव हा शब्दांनी घात केला  उरला फक्त एकांत झुला  जसा हलतो सागर खुला  देखण्या सुरांचा नाद हा  घोटून घोटून गायला  प्रतिश्वासांचा जणू हल्ला  श्वासांनी कसाबसा पचवला  आता झुलवता झुलवता  तुटलं आकाश पेटला वणवा  भग्नावस्थाचा हा राग   पेटत्या झाडांनो तुम्हीच मिटवा  ह्या तरल शांततेचा  हा असा सरळपणा  ह्या शांत थंडीतून  'तो' मुसळधार पाझरावा  पाझरलेल्या थंडीतून  शांत व्हावं सार  स्थिरावलेल्या झुल्यावर  निपचित पडाव गार वार  

कुछ रास नही आया

तेरे रोशन चेहरे की रोशनी का ये लम्स इतना सच्चा था की  चल बसा अफ्ताब की तरफ  पर चाँद बनने का  तेरे जमाल का ये खेल  कुछ रास नही आया  जब से ये रात हुई है  मै अपने ही मौत का जनाजा  ले के घूम रहा हू  पर जो पेशलफ्ज मे ही फसे  ओ तेरी कहाणी का कारनामा  कुछ रास नही आया  जिस फुल को छुआ था  तुने भी मैने भी  जिसके काटे चिपके थे  मेरे खुरदरे हातों को   उस फुल का ये हिसाब   कुछ रास नही आया  मरिजे ख्वाब से तुने ख्वाब चुराये  सुबह भी धुंधली हुई  उस सुबह सर्द हातों से  गले लगाकर तेरा उन्ही ख्वाबो को  मेरेपास ही गिरवी रखना  कुछ रास नही आया  बादलों के गिरते उन्ह बुंदों से  रोशनी का तीर सात रंग लेता है    पर इन्ह आसूओ से  तेरे नजर के तीर जाते है  तभी इस बेरंगी दाग का चमकना कुछ रास नही आया  

कातिल

ना कोई लब्ज है ना है कोई  जब्जा पास है सिर्फ तजुर्बा कत्ल होने का  आदत हुई है कातिल की भी  पर डर है की  कातिलों के जमघट में  मेरी प्यार की नज्म ना मर जाये  नफरत के खंजर से  मेरी गज़ल का गला ना कट जाये  तुम तो हो ही  मेरा जिस्म बेदिल ना बन जाये  खुदा ईश्वर भगवान मानने वाले ये दुश्मनो   मै भी काफिर हू  आना यहा भी कभी  कत्ल करना मेरा भी  पर इन्ह हर्फ को सुनने की तमीज रखना  जिन्ह होठों से खून पिते हो कभी उन्हसे किसीके लब भी चुमना 

बारिश

राधा आ कर नाच रही है बारिश मे मेरे साथ भिग भी रही है पर आवाज तो तेरे घुंघरुओं की है तेरे घुंघरू राधा ने चुराये है या तुही आयी है राधा बनकर? बारिश की बुंदों ने पलकों के पिछे छिपाया है तेरी सुरतसा कुछ तेरी गालो की लाली उतर गयी है बुंदोंपर लेकीन बुंदोंने छुपाया है तुझे या तु आयी है बुंदो को लेकर? अभी ठंडी हवाओं का छुके जाना जैसे तेरा बाहों मे आना शजर की शाखाओं का मुस्कुराना जैसे तेरी झुलफों का लेहराना असल मे तुने बारिश लायी है बादलों से मिलकर तेरे साथ की ये बारिश ऐसे ही बरसने दे उन्ह बुंदों का अपनापन दिल की प्यास बुजाता है विरानगी मे भी