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हम इंसान बन गये..

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कुछ जमिन की पीठ पर जल गये कुछ जमिन के पेट मे दब गये कमजोर थे मकान जो टुट गये कमजोर थे जिस्म ओ   बेघर हो गये लहु लावा की तरहा बहता रह गया आसमान काला था कालाही रह गया मरी हुई मा का पल्लू पकडे बच्चा रो रहा था गली गली रंगीन झंडा लहरा रहा था दुऑ से भी बढता धुऑ गहरा था किसी की मौत किसी की अमन का जरिया था कुछ मरते रह गये कुछ मारते रह गये अमन की राह पर सब ऐसेही चलते रह गय्रे कुछही दिनो मे मुझे नयी पहचान मिल गयी मेरे दोस्त पिटर और मेरे बीच नयी दीवार बन गयी धीरे धीरे करिम अब्बू के कंदिल दिवाली मे झगमगाना भुल गये अब रामूचाचा के लड्डूभी रमजान मे स्वाद बिसर गये जानवर थे हम सब, अभी हम इंसान बन गये..

पहली बार

देखा जब तुम्हे पहली बार रास्ते के दाईन ओर जहा भीड थी वहा खडे थे तुम खिलते मोगरे के बाजु मे कुछ बाते कर रहे थे किसी के संग बाते सुनते सुनते हम वहा आये कहा तुम्हारा नाम क्या है? खिलता हुआ मोगरा नि:स्थब्ध हो गया रास्ते का दाईना ओर शांत हो गया इस शांती मे लब्ज शांती से तुम्हारे पास आये होग़े शायद तुम्हारे लब्जों की राह देखते देखते मोगरा फिर से खिलने लगा दाईं ओर रास्ता फिरसे चलने लगा मैने फिरसे पुछा नाम क्या है तुम्हारा तभी मुडकर देखा तुम्हने हमनेभी चुपचुपकर कुछ देखा देखते देखते तुम्हने कुछ कहा हम कुछ बोल दे इतने मे तुम्हने रुख बदला रास्ते के उस ओर आसमान खुला था यहा बादलों का साया था अब साया टुटने लगा बारिश की बुंदे बरसाने लगा बारिश मे शायद तुम कुछ ढुंढ रहे थे ढुंढते ढुंढते उस ओर चले गये उस ओर धीमा उजाला था इस ओर शाम का धीमा अंधेरा था यहा मोगरा भीग गया रास्ता सुमसान हो गया इस माहोल मे तुम दुर जाने लगे पानी की धार मे तुम्हारे कदमों के निशाण अपनी राह बनाकर चले गये.. हर सुबह रोशनी क्षितिज के उसपर आती है आखों के दरारों मे अपना आशियाना बनती है हम भी आते है हर ...

यहा इंसान इंसान बन जाता है.

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दो सासो के बीच का ये ठहराव यहा कही खो गया है.. धडकनों ने यहा लहरों का पहनावा पहन लिया है.. यहा ना कोई सरहद है, ना है इंसानी दिवार.. यहा है जिंदगी के अंग बेशुमार.. फिर भी कुछ अधुरा है, सागर से दुर जानेवाली भाप का अधुरापन, आसमान मे बुजनेवाले चिरागों का अधुरापन, कही ओर रहनेवाली जिंदगी का अधुरापन.. रात ऐसेही बढती रहती है सुबह के इंतेजार मे.. उस रात का अधुरापन.. इन्ह सब मे मै हैराण हो गया हु.. ठंडी हवा बह रही है या कोई छु रहा है? बादल शर्मा रहे है या ओढनी उड रही है किसी की? यहा सच मे अंधेरा है या मेरी ही ऑखे बंद है? मै सच मे हैराण हु.. यहा कौन अनंत है? थोडी दुरी पर आसमान का अंत है मेरे दिल मे भी एक दिगंत है वक़्त के साथ अफताब भी यहा रुक जाता है यहा जिंदा रहकर भी इंसान इंसान बन जाता है.

भेट तुकोबाची

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वैकुठवासी एक । भेटला मज वाट धरली आम्ही । पंढरीची त्याचे भलतेच साहस । म्हणे उजेड शोध मला रात्रीची साथ । तिमिरासाठी तो सांभाळे भार । स्वत:चाच स्वत: मी वाहतो भोग । चंद्रभागेत त्याचा त्यावर रोष । विटेचा सुटेना मोह मी असा शांत । माझा लोभ देहावरी त्याचा हा हट्टाहास । गोड व्हावा शेवट मी करतो आभास । सुख-दु:खांचा मी म्हणे तुकोबा। हाच का मोक्ष आता बुडवी गाथा । मोक्षासाठी तुका म्हणे विवेक । बस झाला खेळ मी करतो सुरवात । नव्या खेळाची

मै खाली किताब बन जाता हु

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जहा घर था मेरा वहा शाम आती है सुबह सुबह शाम होते ही चली जाती है मै घर की चौकट बन जाता हु कल तक खुरदरी थी जमिन, सुना है वहा नदी बहती है खत लिखने का जमाना गुजर गया मै अभी भी कलम ढुंढ रहा हु पता नही किस रास्ते पर हु पता नही हातों की लकिर है की राह कोई लकिरे नींदसी गहरी है, मै तकिया बन जाता हु, बादल छूते  है पहाड या पहाड निगल जाता है आसमान बुंदे बरसती है राहो में मैं बहता लावा बन जाता हु रोशनी पत्तोंपर कुछ लिहिती है और मिठ्ठी जमिनपर जिंदगी रंगीन स्याही है मै खाली किताब बन जाता हु हर रोज मै मिलता हु मेरे जैसे किसी अंजान से ओ मुस्कुराते हुए दुर जाता है मै कल के सोच मे डुब जाता हु

हम बेकार हो गये

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मौत से हम खफा थे, पर तुम्हारे प्यार मे हम उसीसे इश्क कर बैठे जल रहा था आसमान दिल का तुम्हारे नाम से, हम सिर्फ धुऑ देखते रह गये हमारे दर्द की बद्बू ऐसी थी की लोग दुर चले गये हम यही खुशबू सूंघते रह गये जब आग लगी थी इस शहर मे तुम ज्वाला बनकर आकाश मे मिल गये हम राख हो कर यही बस गये काम की थी जिंदगी, हम भी काम के थे तुम्हने दिल क्या तोडा जिंदगी आवारा, हम बेकार हो गये आनेवाले पल के साथ तुम चले गये अगली मंजिल पर हम गुजरते हुये वक़्त के साथ पिछेही रह गये आधी अधुरी कहाणी पढकर तुम्हने किताब बंद कर दी हम तो शायरी लिखतेही रह गये

तुम ही बताओ

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घाव गहरा है कोनसी दवा दू वार तुम्हारा था कोनसी सजा दू दिल का घर था मेरे दिल मे तुम्हने चुराया अब कोनसा पता दू आसमान खत्म हुआ है यहा तुमसे मिलने कितने पहाड मिटा दू आखे मुन्नवर इतनी सुबह रुक गयी यहा तो रात है मै कोनसा दिया दू शराबी आखे अब तडपा रही है बची हुई शराब मै कैसे लौटा दू विवेक ही गुनहगार है हम सब का तुम ही बताओ मै कोनसा फैसला दू